अखिल भारतीय साहित्य परिषद शाजापुर के तत्वावधान में चैत्र प्रतिपदा के निमित्त पुस्तक विमर्श एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन स्टेशन रोड स्थित कवियत्री कविता पुण्ताम्बेकर के स्वनिवास पर हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के श्री चित्र पर दीप प्रज्वलन और माल्यार्पण से हुआ। प्रथम सत्र में सुप्रसिद्ध कवि डॉ. दुर्गा प्रसाद झाला की काव्यकृति “सूरज का हरकारा” पर सारगर्भित विमर्श हुआ।
संचालक व वक्ता अखिल भारतीय साहित्य परिषद के अध्यक्ष श्री जितेन्द्र देवतवाल ‘ज्वलंत’ ने पुस्तक तथा रचनाकार का परिचय देते हुए कहा कि — “यह संग्रह आम जन की पीड़ा, संघर्ष, और सामाजिक चेतना को स्वर देता है। कविताएं केवल प्रश्न नहीं उठातीं, समाधान की राह भी दिखाती हैं।”
मुख्य अतिथि योगेश उपाध्याय ने कहा — “मुझे लगता है हर कविता जैसे डॉ. झाला पर ईश्वरीय रूप में अवतरित हुई हो। वर्तमान समय के सभी पक्षों को यह संग्रह समेटे हुए है।”
हरिओम पाटीदार ‘लाहौरी’ ने उनके विश्व ग्राम की अवधारणा पर विस्तार से प्रकट किया।
विशिष्ट अतिथि डॉ. विद्याशंकर ‘विभूति’ ने कहा — “उनकी रचनाएं श्रमजीवी समाज के लिए है मेहनत कश मजदूर के लिए है प्रकृति के उन उपादानों के लिए है जिन्हें वे अक्षुण्ण रखना चाहते हैं।”
विशिष्ट अतिथि डॉ. मनोहरलाल राय ने कहा — “डॉ. झाला की कविताएं प्रकृति के प्रति गहरा आत्मविश्वास और संबंध दर्शाती हैं।”
परिषद के संरक्षक वरिष्ठ कवि कैलाश गोंड ने कहा — “यह संग्रह अपने समय का दस्तावेज़ है, जिसमें अत्यंत सरल भाषा में गहन सामाजिक सन्देश समाहित हैं।”
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं श्रीमती संतोष शर्मा ने कहा — “उनकी कविताएं अपनी रश्मियों से सूरज का हरकारा बनी है जो पाठकों के भीतर चेतना की लौ जगाती हैं।”
सारस्वत अतिथि डॉ. जगदीश भावसार ने इसे कर्म और धर्म को दिशा देने वाली कृति बताया। उन्होंने कहा कि — “कर्म, उद्देश्य, धर्म पूरा करने के लिए प्रशस्त करती हैं सूरज का हरकारा कृति।”
द्वितीय सत्र: काव्य गोष्ठी
दूसरे सत्र में काव्यपाठ की रंगारंग प्रस्तुति ने कार्यक्रम को भाव और रस की ऊँचाइयों पर पहुँचा दिया।
बालचंद सूर्यवंशी ने मालवी रंग में डूबी रचना “मेला माय गोरी मान्हे साथ चाल ओ” प्रस्तुत कर शाजापुर मेले की लोकध्वनि को जीवंत कर दिया।
कविता पुण्ताम्बेकर ने “बसंत नहीं आता अब” और एक भावपूर्ण ग़ज़ल पेश की।
हनीफ राही ने व्यंग्यपूर्ण ग़ज़ल “कुछ ऐसे लोग हमारे यहां भी रहते हैं” के माध्यम से श्रोताओं को सोचने पर विवश कर दिया।
डॉ. मनोहरलाल राय की कटाक्ष से भरी पंक्तियाँ “बात मेरी कड़वी है और लगेगी भी बुरी” देर तक गूंजती रहीं।
हास्य कवि मशहूर शाजापुरी ने अपनी चुटीली रचनाओं से वातावरण में ठहाकों की फुहारें भर दीं।
जितेन्द्र देवतवाल ‘ज्वलंत’ की ओजमयी नववर्षीय रचना “नव सम्वत्सर आया देखो, रस-रंगों की छाया देखो” ने नई उमंग का संचार किया।
कैलाश गोंड ने “जमाने में” जैसी धारदार ग़ज़ल से सामाजिक चेतना को झकझोरा।
श्रीमती संतोष शर्मा ने “ये अंदाज़ा बदलेगा न ये जज़्बात कम होंगे” कहकर भावनाओं को शब्द दिए।
हरिओम पाटीदार ‘लाहौरी’ ने “लड़का हो बाबू, जीना सीख लो जिम्मेदारियों में” जैसी यथार्थपरक रचना से दिलों को छुआ।
कार्यक्रम का संचालन अखिल भारतीय साहित्य परिषद शाजापुर के अध्यक्ष जितेन्द्र देवतवाल ‘ज्वलंत’ ने अपनी ओजस्वी शैली में किया।
श्रोता दीर्घा में कमलाकर पुण्ताम्बेकर, गणपत राठौर, महेश राठौर, दयाल विश्वकर्मा सहित अनेक साहित्य अनुरागी उपस्थित रहे।
