मुस्तफा अली, शाजापुर।
वर्ष की शुरूआत हुसैनी ग़म के साथ करने वाले शिआ और उसमें शिआ दाऊदी बोहरा समाज की एक ऐसी पहल जिसने अब यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या ऐसा हो सकता है कि बस 10 दिन हुसैन ही हुसैन हो।
बोहरा समाज के सयैदना साहब ने संदेश दिया कि हम हर काम में खुदा से हुसैन अ.स. के वसीले से मांगते हैं, क्योंकि हुसैन ने इस्लाम को जिन्दा रखने के लिए अपने परिवार के साथ कुर्बानी दे दी, आज उसी मौला हुसैन के लिए क्या हम सब कुछ छोड़कर कुछ दिन उनकी मुसिबत और एहसानों के बदले उनको याद नहीं कर सकते ?’’ यह एक ऐसा संदेश है जो यह बताता है कि हुसैन का क्या रूतबा है।
पर व्यापार बन्द क्यों ?, आज व्यापार बन्द करने का मुख्य कारण यह है कि बोहरा समाज व्यापारी कौम है जो प्राथमिकता व्यापार को देता है। हम जब मस्जिदों में आते हैं तो हमें अपने ग्राहकों की कहीं न कहीं चिंता को साथ ले आते हैं, जाने अनजानें में इबादत के वक्त व्यापार की तरफ ध्यान चला जाता है, जब व्यापार पर ही विराम लगा दिया जाए तो ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता स्वयं ही समाप्त हो जाती है।
जब देने वाला हुसैन के वसीले से दे रहा हो तो लेने वाला कही और क्यु जाए। व्यापार पर विराम लगाने का समाज का यह कदम यह भी सिखाता है कि भक्ति में लीन होने के लिए कठिन प्रयास की नहीं बल्की सही प्रयास की आवश्यकता है। साथ ही व्यापार पर विराम अपने आप को स्वयं तो इस बात के लिए तैयार करना है कि हम हुसैनियत के लिए अज़ादारी के लिए तैयार हैं।
साथ ही एक जगह एकत्रित होकर अपने धर्मगुरू के आदेशों का अनुसारण करते हुए उनकी मंशा को पूरा करना, जैसे एक ही तरह का लिबास, तय समय पर अज़ादारी और भोजन एक सभ्य समाज को दर्शाता है जहां अमन-चैन को प्राथमिकता, और व्यापार को कर्म, सुखी जीवन व्यापन करने के लिए पर्याप्त है।
– Mustafa Ali
